क्या?
तुम्हें पता है
तुम्हारी ये सागर से भी गहरी आँखें,
कभी मुझे सूरज तो
कभी चाँद के जैसी लगती हैं
जिनके जगने से मेरा सवेरा
और सोने से रात हो जाती हैं।
तुम्हारी मुस्कान तो
खिल-खिलाती हुई वो मंदाकिनी है
जो भर देती है मेरे मन के अंधेरों में
कभी न खत्म होने वाली उम्मीद की रोशनी
और तुम्हारा हृदय,
आकाश गंगा का वो केंद्र बिंदु है
जिस से निकलती है,
प्रेम भाव की अनगिनत धारा
जो मुझे थामे रहती है
अपनी विशाल भुजाओं में
जिसके सहारे मैं पार कर जाती हूँ
जीवन सुनामी के सभी ज्वार।
पर तुम्हारा गुस्सा है, ना
किसी ज्वालामुखी के जैसा है
जो तुम्हारे चेहरे को
मंगल ग्रह बना देता है, एकदम लाल
और तुम्हारी नाराज़गी होती है
किसी ग्रहण-सी क्षणिक
जिसमें रखने होते हैं,
बस थोड़े बहुत एहतियात
हाहाहाह!
वैसे तुम ये जो प्यारी-प्यारी बातें
करते हो ना
वो प्रेम पवनें बनकर
मेरे मन-मस्तिष्क के
अक्षांशों पर निरंतर चलती रहती हैं।
तुममें पृथ्वी जैसा गुरुत्वाकर्षण है
जो सदैव मुझे खींचता रहता है, तुम्हारी ओर
तुम मेरे जीवन में, अब
नार्थ पोल का वो ध्रुव तारा बन गये हो
जो भटकने पर हमेशा मुझे राह दिखाता है,
और हाँ एक बात तो बताना ही भूल गई
तुम्हारे पढ़ाए भूगोल से ही मैं ये जान पाई हूँ
की, मैं तो अनंत ब्रह्मांड के प्रेम में हूँ
जिसमें निरंतर,
खोजी वा पाई जाती है कोई
जिजीविषा।
देवप्रिया ‘अमर’ तिवारी
दुबई, यूएई
स्वरचित और मौलिक रचना










